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The Afterlife of Feeling


Ghazals, ashaar, nazms, Urdu free verse and modern Hindi free verse — set in their own scripts, as they were written.

Ghazal  ·  Urdu, in Devanagari

सब पता है रहनुमा हमको कहाँ ले जायेंगे, हाँक कर हमको अंधेरों में, शमा ले जायेंगे। दोपहर में अब न सोया कीजिये यूँ बेधड़क, दिन दहाड़े आपका सूरज उठा ले जायेंगे। यूँ न दुखड़ा रोते रहिए हर किसी के सामने, वो करेंगे कुछ नहीं, केवल मज़ा ले जायेंगे। जगलरी फ़ैशन में है,अय्यारियों का दौर है, वो नज़र में से नज़रिया तक चुरा ले जायेंगे। आज के अख़बार हैं, इन पर भरोसा कीजिये, इश्तिहारों में कहीं सच को दबा ले जायेंगे। आँधियां बनने नहीं देतीं चराग़ाँ आजकल, फिर बवंडर चाक से मिट्टी उड़ा ले जायेंगे।

Ghazal  ·  Urdu, in Devanagari

मेरे अनजान काँधे पर तुम्हारा सर टिका देना, सफ़र में अजनबी बच्चे का जैसे मुस्करा देना। अधूरे ख़त छुपा रखे हैं सब मैंने किताबों में, मेरा फ़न है इनामी बाग़ियों को आसरा देना। त'अल्लुक ना रहे लेकिन मेरा अख़्लाक क़ायम है, मेरी फ़ितरत है बेहोशी में भी वादा निभा देना। कोई जो पूछ ले, मेरा तुम्हारा क्या मरासिम है, तो यूं करना, हवा में एक मुठ्ठी रंग उड़ा देना। अक़ीदत ये कि तुमको बिन बताये चाहते रहना, अज़िय्यत ये कि फिर तुमको बिना पाये गँवा देना। हमारे बाहमी ख़्वाबों की सब रूहें भटकती हैं, तुम उनकी राख ले जा करके गंगा में बहा देना।

Ghazal  ·  Urdu, in Devanagari

ज़रा सा हूँ बहुत सारा नहीं हूँ, मैं नन्ही लौ हूँ,अंधियारा नहीं हूँ। मैं शबनम हूँ मेरा अपना हुनर है, समन्दर की तरह खारा नहीं हूँ । मैं खुद्दारी की क़ीमत जानता हूँ, किसी भी आँख का तारा नहीं हूँ। मैं तकलीफ़ें बिछाता ओढ़ता हूँ, मैं हूँ गर्दिश में, बेचारा नहीं हूँ। कुछ अपने रहनुमाओं का करम है, महज़ हालात का मारा नहीं हूँ। ज़ख़म छोड़ो मेरी आँखो में देखो, मैं घायल हूँ मगर हारा नहीं हूँ।

Ghazal  ·  Urdu, in Devanagari

खिला दे फूल बंजर में, अंधेरों में सहर कर दे, मोहब्बत आए अपने पे तो जाने क्या असर कर दे। मोहब्बत के लिये पैग़ाम मेरा मुख़्तसर सा है, मेरे ये ईंट पत्थर तू अगर चाहे तो घर कर दे। परिन्दा पाल रखा है कि कोई तो रहे घर में, मेरे घर लौट आने की मुझे भी जो ख़बर कर दे। भरोसा इस क़दर भी इर्तिक़ा पर मत किया कीजै, न जाने कौन पल फिर आदमी को जानवर कर दे। कभी बीमा के कागज़ मुफ़लिसी में बोल उठते हैं, जो जीते जी न दे पाया वही अपनों को मर कर दे। बड़ी आसां पहेली है, बताओ कौन अजूबा है, जो पूरी ज़िन्दगी बच्चों की जूठन पर बसर कर दे। मेरे वालिद का कहना था, यहाँ पगड़ी वही बाँधे, कि जो पगड़ी की ग़ैरत के लिये कुर्बान सर कर दे

Ghazal  ·  Urdu, in Devanagari

जनाब सच को साज़िशों ने बचा रखा है, मैं हूँ चराग़ फिर भी नाम हवा रखा है। नाव कागज़ की तैरती है गहरे पानी में, इसी उम्मीद पे सब दाँव लगा रखा है। छोटे बच्चों की तरह नींद में टटोलते हैं, वो जो सपनों का पोटला था कहां रखा है। तमाम ज़ख़्म नुमाइश से छुपाये रखना, इसी हुनर का नाम हमने दवा रखा है। हमारे ज़र्फ ने हाथों को पसरने न दिया, वगरना भूख से लड़ने में क्या रखा है? आज फुटपाथ के कोने में बड़ी रौनक है, माँ ने चूल्हे पे आज फिर से तवा रखा है।

Ghazal  ·  Urdu, in Devanagari

जिंदगी बह रही चनाब के धारों की तरह, मैं पीछे छूट जा रहा हूँ किनारों की तरह। आँख मलता हूँ सुबह हाथ झुलस जाते हैं, मेरे ख्वाबों का रवैया है शरारों की तरह। अपने बच्चों की ख्वाहिशों के वास्ते अक्सर, बाप को टूटना पड़ता है सितारों की तरह। ज़रा खराब हो मौसम तो फिर पता भी चले, कौन रिश्ते  हैं मेरी छ्त में दरारों की तरह। छोड़कर शहर की तमीज़-ओ-तक्ल्लुफ़ सारे, आजा लग जाएं गले ठेठ गंवारों की तरह। मैं आख़िरी लम्हे तलक़ उम्मीद रखता हूँ, मेरा यक़ीन है राशन की कतारों की तरह।

Ghazal  ·  Urdu, in Devanagari

उन्हीं के किस्से बादल अपने बच्चों को सुनाते हैं, जो हर बरसात पे मिट्टी के घर फिर से बनाते हैं। कहीं मखमल की चादर पर अकेली नींद रोती है, कहीं फुटपाथ पर मिलजुल के सपने मुस्कराते हैं। हथेली में मुक़द्दर की लकीरें सबको दिखती हैं, मगर पैरों के छाले देखना सब भूल जाते हैं। दियानत, आबरू, किरदार, ग़ैरत, फर्ज़, खुद्दारी, सुना है आज भी किस्सों में ये अल्फाज़ आते हैं। तुम उस पलड़े में मेरी उम्र भर के सोज़ लाये हो? ज़रा रुकना हम अपना इश्क़ वाला बाट लाते हैं। ।।।

Ghazal  ·  Urdu, in Devanagari

मैं तुमसे ये नहीं कहता कि रिश्ते तोड़कर आते, सुकूँ लेकिन बड़ा होता अगर सब छोड़कर आते। अगर हम सीख भी लेते हुनर सब दुनियादारी के, सियासी इम्तिहानों में हमें फिर भी सिफर आते। अन्धेरे की खिलाफ़त में बस इक आवाज़ देते तुम, उजाला ले के जुगनू भी, दरख़्तों से उतर आते। ज़माने को जो हमने सर चढ़ा रखा नहीं होता, तो बेवाओं के दामन में भी बच्चे रंग भर आते। कि जितनी देर में तुम आख़िरी हिचकी लगाते हो, हम उतनी देर में इज़्ज़त से सौ सौ बार मर आते। यहाँ सय्याद देता है नसीहत हम परिंदों को, नहीं पिंजरे में रहना था तो पंखों को कुतर आते। गनीमत है कि सपने खारे पानी में नहीं घुलते, वगरना माँ के सारे ख़्वाब पल्लू में नज़र आते।

Ghazal  ·  Urdu, in Devanagari

वो जब औलाद की खातिर दुआ में हाथ उठाती है, तो किस्मत मुंह छुपा लेती है, मेहनत मुस्कुराती है। भलाई भी करो तो एहतियातन फ़ासला रखना, चरागों को जलाती आग उँगली भी जलाती है। तवाज़ुन के उसूलों की बड़ी पाबन्द है कुदरत, जो मिट्टी से उगाती है वो मिट्टी में मिलाती है। उजाले तो मकानों में कई रस्तों से आते हैं, घरों में आज भी रौनक़ मगर बेटी ही लाती है।

Ghazal  ·  Urdu, in Devanagari

अब परखने के तरीक़ों को बदलकर देखता हूँ, आग कितनी पाक़ है मैं आज जलकर देखता हूँ। साफ़गोई आईने जैसी कहां से लाऊँ मैं, आईने को तोड़कर किर्चें निगल कर देखता हूँ। मैं रगों में उम्र भर ख़ामोश क्यों बहता रहा, आख़िरी इस दौर में थोड़ा उबल कर देखता हूं। मैं किसी के दिल को पत्थर के बराबर बोल दूं, उससे पहले बाख़ुदा मैं ख़ुद पिघल कर देखता हूं। आसमां में शोर होते ही, लड़कपन की तरह, आज भी हर बार मैं बाहर निकल कर देखता हूँ। मैं हक़ीक़त में गले कैसे लगा पाता कि जब, ख़्वाब में भी मैं उसे इतना संभल कर देखता हूँ। आँख में आंसू लिए और सर झुकाये रंज में, जूतियों से ख़्वाब सब अपने मसलकर देखता हूं। हड्डियों के राख़ होने तक रहा मैं मुन्तज़िर, और फिर गंगा की लहरों से उछलकर देखता हूँ।

Free verse  ·  Hindi

कठिन समय में बच्चों की गुल्लक का किसी प्रकार बचे रह जाना पिता के बारे में कुछ कह देता है। कठिन समय में गुल्लक लाकर पिता की बगल में चुप चाप रख कर चले जाना, बच्चों के बारे में काफ़ी कुछ कह देता है। कठिन समय में गुल्लक पिता से छीनकर घर की उस अज्ञात जगह छुपा देना, माँ के बारे में बहुत कुछ कह देता है। कठिन समय में गुल्लक को फोड़ना अनिवार्य हो जाना, घर के बारे में कुछ नहीं कहता, बाहर के बारे में सब कुछ कह देता है।

Free verse  ·  Hindi

पंखे में रस्सी के लटका दिये जाने पर मरना शेष नहीं रहता। फंदे के कसने से बाहर आ गई ज़बान व्यक्ति की नहीं होती। रस्सी से झूलती लाश नहीं होती, लाशें होती हैं।

Free verse  ·  Hindi

सिनेमा जिस दौरान सिखाता रहा पीढ़ियों को कि मर्द है वो जिसको नहीं होता है कभी दर्द। उसी दौरान कुछ मर्द इस बेदर्द दुनिया को बनाते रहे जीने लायक़, क्योंकि उन्हें दर्द हुआ दूसरों के दर्द से।

Free verse  ·  Hindi

सरकारी अस्पताल के भिनभिनाते गलियारे की पान की पीक से लाल दीवार। दीवार से सटी माँ की गोद और गोद में रखे सिर पर ओढ़ाया हुआ पिता का अँगौछा। गोद और अँगौछे के बीच में वो जिसकी मनौती में बँधी है माँ की धोती की एकमात्र गाँठ। इस गाँठ को खुलवाने भर का सामर्थ्य है यदि किसी ईश्वर में, तो लो, मान लेता हूँ आज कि थक चुका हूँ मैं भी माँओं की बाँधी हुई ऐसी तमाम गाँठों के कभी न खुल पाने की सर्द नास्तिकता से।

Free verse  ·  Hindi

हमारी पीढ़ी के अधिकतर लड़के गले नहीं लग पाये कभी अपने पिता के। उनके गले लगने से कहीं सरल था नज़रें झुका कर जल्दी से बस उनके पैर छू लेना। रेल-बसों में उनकी बगल में बैठने से सरल था, उनकी साइकल पर पीछे बैठ जाना। भावुक क्षणों में नम हो जाती पिता की असहज आँखों में दोबारा देखने से, दोबारा न देखना सरल था। गले तो पिता भी लगा सकते थे किन्तु इस गले लगने की असहजता वो भी जानते थे तब से जब से वे किसी के लड़के थे। अचानक एक दिन जब उनकी चिता को अग्नि देना कठिन लगा, तब लगा कि उनके गले लग जाना इतना भी कठिन नहीं था।

Free verse  ·  Hindi

माघ मेले में बिछड़ गए माँ बच्चा एक दूसरे को तलाश कर थक गए। पुलिस वाले से माँ ने पूछा - क्या अपने कोई बच्चा देखा जो माँ के लिए बहुत रो रहा हो । उधर रोते बच्चे ने भी पूछा पुलिस वाले से - क्या आपने कोई माँ देखी है, जो मुझसे भी ज़्यादा रो रही हो।

Free verse  ·  Hindi

नदी की सतह पर एक बार नंगे पाँव चलकर पार जा सकने वाला भगवान कहलाया। अपनी नौका में जो सबको लेकर आए गए नदी के पार कई बार वे कहलाए नाविक। बहुत कुछ कहा गया है, भगवान और नाविक पर, और इन दोनों के एक-दूसरा होने पर। लेकिन वे जिन्होंने लकड़ी और लोहे से बनाई असंख्य नौकाएँ- वे कुछ कहे ही नहीं गए। वे बस नौकाओं में जीवित रहे, बनकर बीच का रिक्त भाग। जिसमें बैठकर पार होते रहे, नाविक, लोग और उनके भगवान।

Free verse  ·  Hindi

घर के आँगन में एक पेड़ के नीचे खेलते हुए बड़ा हुआ था एक बच्चा। घर बदल जाने पर, उसके साथ साथ रहता था पेड़ का अकेलापन। उसने सुना नई तकनीक पेड़ को भी कर सकती है प्रत्यारोपित। पेड़ को उखाड़ा गया बहुत प्यार और सावधानी से, ताकि बची रहें उसकी जड़ें। नई मिट्टी में पुराना पेड़ हराभरा रहा कुछ समय। फिर सूखने लगा धीरे धीरे। किसी ने कहा नई जगह पर प्रबन्ध तो था, सम्बन्ध नहीं था। बेटा बुज़ुर्ग पिता को, और पिता बुज़ुर्ग पेड़ को देर तक देखते रहे।

Free verse  ·  Hindi

युद्ध में एक ने दूसरे को हरा दिया। हरा देना संभव होता है इसलिए हरा दिया। कुछ लोग थे जो अंततः बच गए थे। वे अपनी जीत के पास थके हारे खड़े थे। युद्ध में संभव होता है विनाश, समझौता, हारना और हराना। नहीं संभव होता जीतना। जैसे दिन भर में बिना किसी को हराए, घर लौटकर बच्चों से हार जाना, जीत जाना हो सकता है। युद्ध में लेकिन कभी भी वैसी कोई जीत संभव नहीं होती।

Free verse  ·  Hindi

यातना से, सब समझदार नहीं हो जाते। तमाम लोग हो जाते हैं और सशंकित, और भंगुर, और कड़वे। जैसे पोछे का लत्ता, साफ़ तो हो जाता है सूखकर, लेकिन भूल सा जाता है, अपना पहले का लचीलापन। बिगड़कर लौटे लोग, लाते हैं बिगड़े शब्दकोश; वे मौन को शान्ति, थकान को गहराई और सुन्नता को सहनशीलता मानकर जीना सीख लेते हैं। सबको नहीं बदलता आग से होकर लौटना; कइयों को बदलती है, लौटने बाद की सुबह; जब तय होता है कि आजीवन अव्वल ईंट का मुखौटा पहनकर, अग्निपथ की प्रशस्ति पढ़ा करेंगे, अंदर से झाँवा-रोड़ा हो गए लोग। और फिर यह समाज जिसकी आजीविका ही है लावारिस मिथकों को गोद लेकर पालना, बड़े यत्न से पोसता है उन बहुरूपियों के स्वाँग को, उनके अन्ततः बहुत कड़वे हो जाने तक। कोई जब न देख रहा हो, वे मिटा देते हैं कुछ इलाक़े, अपनी वेदना के मानचित्र से, छिपा देते हैं बड़ी चतुराई से, अपने ताज़े घावों के पीछे, यातना के बजबजाते हस्ताक्षर। ऐसे तमाम लोग, यातना से समझदार नहीं होते; ऐसे तमाम लोग, यातना के साझेदार हो जाते हैं।